श्रद्धा एवं भक्तिभाव पूर्वक श्री बालाजी धाम खेतुई हरदोई में चल रहा श्री नवकुण्डी हनुमत महायज्ञ

17 जून (हरदोई) ब्यूरो रिपोर्ट विनय वाजपेयी श्री बालाजी धाम खेतुई हरदोई में चल रहा श्री नवकुण्डी हनुमत महायज्ञ एवं श्रीमद्भागवत सप्ताह ज्ञान यज्ञ एवं विराट संत सम्मेलन में आज आयोजन के चतुर्थ दिवस के शुभ अवसर पर धाम में स्थापित सभी देवी-देवताओं का पूजन,जप,पाठ तथा यज्ञ मण्डप में हवन यज्ञ किया गया।
इस अवसर पर पं० विकास वाजपेयी जी महाराज जी के द्वारा महाभारत के माध्यम से शांतनु और गंगा के विवाह का प्रवचन सुनाया गया।
वाजपेयी जी नें बताया एक दिन,शांतनु को तेज प्यास लगी और आस-पास कोई सेवक नहीं था।फिर उन्होंने नदी पर ध्यान दिया और गंगा को खोजने लगे। गंगा नदी से स्त्री रूप में प्रकट हुईं।जैसे ही शांतनु ने गंगा को देखा, वह एक बार फिर प्रेम में पड़ गए। उन्होंने गंगा से विवाह करने की विनती की। गंगा तैयार हो गयी, पर गंगा ने एक शर्त रखी –“मैं आपसे शादी करुँगी पर चाहे मैं कुछ भी करूं, आप कभी मुझसे ये नहीं पूछेंगे कि मैं वैसा क्यों कर रही हूँ।
महाराज जी नें भक्तों को श्रवण कराया कि शांतनु गंगा के प्रेम में इतने पागल थे कि वह राजी हो गए। गंगा उनकी पत्नी बन गई, जो पत्नी के तौर पर बहुत ही खूबसूरत और लाजवाब थी। फिर वह गर्भवती हुई और एक पुत्र को जन्म दिया। वह तुरंत बच्चे को लेकर नदी तक गई और उसे नदी में बहा दिया।
शांतनु को विश्वास नहीं हो रहा था कि उनकी पत्नीं नें उनके पहले पुत्र को नदी में डुबो दिया। उनका हृदय फट रहा था, लेकिन उन्हें याद आया कि अगर उन्होंने वजह पूछी, तो गंगा चली जाएगी। जो शख्स पहले खुशी और प्रेम में उड़ता फिर रहा था, वह दुख से जड़ हो गया और अपनी पत्नी से डरने लगा। मगर फिर भी वह गंगा से बहुत प्रेम करते थे, दोनों साथ-साथ रहते रहे।
उसके बाद 16 साल गुजर गए, गंगा ने उन दोनों के पुत्र देवव्रत को लाकर शांतनु को सौंप दिया। देवव्रत ने खुद परशुराम से तीरंदाजी सीखी थी और वृहस्पति से वेदों का ज्ञान प्राप्त किया था।
गंगा ने एक और पुत्र को जन्म दिया। वह बिना एक भी शब्द बोले जाकर बच्चे को नदी में डुबो आई। शांतनु पागल हो उठे। उनसे बर्दाश्त नहीं हो रहा था मगर वह जानते थे कि उन्होंने एक भी शब्द कहा तो वह चली जाएगी।
दूसरे बच्चे, तीसरे बच्चे से लेकर सातवें बच्चे तक यह सिलसिला जारी रहा।शांतनु बुरी तरह आतंकित हो गए थे। वह अपनी पत्नी से खौफ खाने लगे क्योंकि वह उनके नवजात शिशुओं को नदी में डुबो दे रही थी। जब आठवें बच्चे का जन्म हुआ तो शांतनु असहाय की तरह गंगा के पीछे-पीछे नदी तक गए। जब वह बच्चे को डुबोने ही वाली थी, कि शांतनु ने जाकर बच्चे को छीन लिया और बोले, ‘अब बहुत हो गया। तुम यह अमानवीय हरकत क्यों कर रही हो।’ गंगा बोली, ‘आपने शर्त तोड़ दी है।अब मुझे जाना होगा। मगर जाने से पहले मैं आपको कारण जरूर बताऊंगी।’
उसके बाद कथाव्यास पं० वालकृष्ण शुक्ल जी महाराज जी नें भक्तों को भगवान शिवजी की महिमा का और उनकी भक्ति का वर्णन कर सती आत्मदाह की अमृतमयी कथा श्रवण कराई।
ये समस्त कार्यक्रम पं० राजेश कुमार मिश्र पुराणाचार्य,यज्ञाचार्य के निर्देशानुसार संचालित हुये तथा इस यज्ञ के आयोजक श्री श्री 1008 स्वामी नागेन्द्र दास जी महाराज जी महंत जी के द्वारा सम्पन्न हो रहा है।
पूजन के आचार्य प्रमोद कुमार मिश्र,सरोज पाण्डेय,ब्रह्मकमल,कौशल शुक्ल, प्रदीप जी,निर्भयदास गिरि जी समेत तमाम भक्त गणों को श्री बालाजी धाम में कथा श्रवण कर अपनें जीवन को सफल करनें का सौभाग्य प्राप्त हुआ।

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